!! औरत !!

मै लिखता हूँ
एक ‘औरत ‘
और तुम सोचते हो –
एक ‘ रात ‘
उसके साथ बिताने के लिए
मै डर महसूस करता हूँ
वैसे ही –
जैसे रेत पर लिखी ,
एक ‘औरत ‘करती है
वह दूर से आती लहरों को-
देखती रहती है
जो कभी बिल्कुल पास आकर –
वापस लौट जाती हैं
वह उस वक्त भी खुश नहीं होती ,
क्यों कि-
उसे पता है ,लहरें फिर उठेंगी-
उसका अस्तित्व मिटाने के लिए
अब मै सोचता हूँ-
क्या लिखू फिर से
एक ‘औरत ‘
या लिखू –
एक ‘आदमी ‘
जो रात बिताने के बारे में न सोचता हो
और उन लहरों को भी लिखू –
जो किनारे आकर खुद लिखे –
एक ‘औरत ‘

!! सियासत !!

जब आप कहोगे

मै देख सकता हूँ

आपको अँधा बनाया जायेगा

जब आप कहोगे

मै बोल सकता हूँ

आपको गूंगा बनाया जायेगा

जब आप कहोगे

मै सुन सकता हूँ

आपको बहरा बनाया जायेगा

आखिर !

आपको अँधा, गूंगा और बहरा बनाने-

वाला कौन है ?

!! मै लिखता हूँ !!

(1)

!! भगवान !!

मै लिखता हूँ
‘भगवान’
जो आत्मनिर्भर है
और निडर भी
लेकिन !!
तुम सोचते हो –
एक ‘मंदिर ‘,
और उसमे रखी-
एक पथ्थर की मूरत

मै खुद को असहाय महशुस करता हूँ
और अकेला भी
तब ,
जबकि तुम घण्टियाँ बजाते हो –
कहीं दूर ,
किसी नदी के किनारे
ये जानते हुए कि-
पानी चढ़ाव पर है
लेकिन !
तुम वहीँ बैठे रहते हो ,
सबके साथ ,
आँखे बंद किये

अब मै सोचता हूँ
क्या लिखू ??
उस ‘भगवान’ को
जो खुद आकर साबित करे-

अपनी अपंगता

या लिखू –
एक ‘नदी’
जो किसी को डुबाती न हो ..

!! नोटबंदी !!

वे भी क्या दिन थे …
जब नोटों ने बदला था रूप
बैंक बना था मंदिर ,
मैनेजर भगवान स्वरूप
होत सबेरे एटीएम के आगे-
सबके चेहरे खिलते थे
तुग़लकी फ़रमान के आगे –
सब लोग बेबस मिलते थे
वे भी क्या दिन थे …
जब नोटों ने बदला था रूप
कतारों में कटती थी रातें-
और कटता था दिन
नागिन नाच करते थे हम –
सरकार बनी थी बीन
वे भी क्या दिन थे….
जब नोटों ने बदला था रूप
खाने के भी लाले पड़ गए
छाया था अँधेरा-घूप
रोज नए कानून बने-
जारी हुए फ़रमान
वादों का अम्बार लगा-
जगाये गए अरमान
वे भी क्या दिन थे …
जब नोटों ने बदला था रूप
अगर क़त्ल कोई जुर्म है तो –
कोई उनसे जा बतलाये
धक्का -मुक्की ,गिरते -पड़ते
कितनों ने थे जान गवाएं
वे भी क्या दिन थे…
जब नोटों ने बदला था रूप
किसी को विधवा किसी को विधुर –
किसी को बेसहारा छोड़ दिया
पूंजीपति सब चैन से सोए –
गरीबी ने दम तोड़ दिया
वे भी क्या दिन थे…
जब नोटों ने बदला था रूप

वो भोली सी सूरत वो नटखट अदाएं
कैसे भुला दू कोई ये बताएं

उसी ने मुझे फिर से जीना सिखाया
उसके बिना कोई मरना सिखाये

रब से दुआ है बस इतनी सी मेरी
देखे जब ख़ुद को मुझे ही वो पाएं

कह दो ‘अखिल ‘ उसको ढूंढे ना कोई
ज़हर का भी प्याला मुझे ही पिलायें

 

!! सपना या सच !!

एक रोज़ मेरी नींद खुली
और खुद से पूछने लगा –
मैं कौन हूँ ?
कहाँ हूँ ?
और क्यों हूँ ?
मैंने बहुत कोशिश की –
जवाब पाने की ,
लेकिन सफल नहीं हुआ
आखिर क्या हुआ होगा मेरे साथ ?

मैंने आस -पास देखा ,
कुछ भी ऐसा नहीं है –
जिसे मैं जनता हूँ,
या वो मुझे जानता हो
बस ! याद है तो हवा –
और उसकी बारूदी-गंध

मेरी धमनियों में सर्द-जमे –
खून में कम्पन सा हुआ ‘
और मैं दौड़ पड़ा,
उस ओर-
और दौड़ता ही रहा ,
बिना सोचे की –
कहाँ पहुँचूँगा ?

मेरी नज़रें कुछ ढूंढ रही हैं,
शायद !!
मेरे जैसे ही किसी और को –
जिससे पूछ सके मेरा वजूद
और उस बीते कल के बारे में ,
जिसे बिस्तर पर ही छोड़ आया था

मेरा इस तरह दौड़ना ,
शायद !!
हवा को भी रास नहीं आया-
और वो एक प्रतिद्वंदी की तरह ,
मेरे साथ चल रही है
जो मेरे लिए अच्छा था

अंततः मैंने हार मान ली ,
और हवा से समझौता के लिए रुक गया
लेकिन हवा को ये मंजूर नहीं था ,
उसने एक विवर का रूप ले लिया –
जिसमे न चाहते हुए भी समाने लगा
और निकला दूसरे छोर पर ,
एक दूसरे आयाम में
जहा चिथड़ो में पड़ी धरती थी ,
और उसके दरारों में फंसे लोग

मैंने एक कराह सुनी –
जो पास पड़े आदमी की थी ,
शायद !!
वो अंतिम सांसे ले रहा था
और ख़ुद को जिन्दा रखने की –
नाक़ाम कोशिश कर रहा था
अपना ज़वाब जानने के लिए ,
मैं उसकी और दौड़ पड़ा
लेकिन !!
उसकी कराह तो एक जरिया भर था ,
मुझको अलविदा कहने का

अब वो शून्य में समा गया था ,
उसकी आँखों में आंसू थे –
जो बहुत कुछ बता रहे थे
मैंने आंसू की एक बूंद को ,
अपनी मुठ्ठी में बन्द कर लिया
शायद !!
वही आख़िरी उम्मीद थी
मैंने पूछा ” तुम कौन हो ?
क्या तुम ही मेरा जवाब हो ? ”
उसने कहा ” हे मनुष्य !
तुम बस मुझे जानने की कोशिश भर कर सकते हो ,
लेकिन जान नहीं सकते |
मैं हमेशा यहीं था –
एक सुखी -समृद्ध राजा के महल में ,
और एक अति-आधुनिक विकसित –
बीते कल में
मैंने देखा है –
विज्ञान को वरदान से अभिशाप बनते ”

फिर उसने जोर देकर कहा –
” जगो और अपने आज में लौट जाओ ”
( और उनसे कहना –
“वैसी चीज़े क्यों बना रहे हो जिसकी कभी जरूरत ही नही ” )

मेरी नींद खुल गई
ख़ुद से पूछा –
” क्या वो एक स्वपन था ? ”
और मुझे ‘दिनकर जी’ की वो पंक्तियाँ
जीवित होती प्रतीत हो रही हैं –
“सावधान , मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार
तो इसे दे फेंक, तज कर मोह स्मृति के पार ”

(05/02/2017)

बहा ले अश्क ‘अखिल’ गम के इस अँधेरे में
खुशियां  लिपटे कभी आएँगी  सवेरे  में